Wednesday, March 21, 2018

#सन्डे_की_चकल्लस ( भाग- 1) सहस्रबाहु नाम के हैहयवंशी प्रतापी राजा हुए थे। जिनका परशुराम से भी युद्ध हुआ था। इन्हीं के भाई थे दक्षिण कौशल के राजा भानुमान।भगवान श्री राम की माता कौसल्या उन्हीं भानुमान की पुत्री थीं। रावण को अच्छी तरह से पता था कि राजकुमारी कौसल्या का विवाह के बाद राम नाम का पुत्र होगा जो उसका वध करेगा। इसी वजह से वह कौसल्या का हरण के उद्देश्य से दक्षिण कौशल राज्य पर बार बार हमला करता था। रावण छत्तीसगढ़ के दक्षिण दिशा से हमला करता था। इसी वजह छत्तीसगढ़ में दक्षिण दिशा को रक्सहूं या राक्षस कहा जाता है। रावण के आक्रमण के समय जनता को सचेत करने के मुनादी की जाती थी। ढोल बाजों के साथडौडी पिटवाई जाती थी। उस जगह को आज डौडी कहा जाता है। सहस्त्रबाहु जिस जगह पर रावण से लोहा लेने पहुंचे उस जगह को सहसपुर लोहारा कहा जाता है। महानदी के तट पर कोसीर गांव में माता कौसल्या का मंदिर है,जो पूरे भारत मे कौसल्या का एकमात्र मन्दिर भी है। कौसल्या छत्तीसगढ़ की थीं। भगवान राम का मामा घर यहीं था। इसी वजह से छत्तीसगढ़ में भांजों को राम स्वरूप मान कर पैर छूकर प्रणाम करने का रिवाज है। हैहय वंश में ही राजा सुद्युम्न हुए। उनके तीन बेटे थे नीलध्वज, हंसध्वज और मोरध्वज। वह द्वापरयुग समाप्ति और कलयुग प्रवेश का काल था। नीलध्वज को उन्होंने महिष्मति- मधानता का साम्राज्य सौंपा जो वर्तमान में ओंकारेश्वर क्षेत्र है। दूसरे पुत्र हंसध्वज को चांदा का सम्राट बनाया जो वर्तमान में महाराष्ट्र का चंद्रपुर है। तीसरे पुत्र मोरध्वज को उन्होंने मणिपुर का साम्राज्य सौंपा जो अब रतनपुर के नाम से जाना जाता है।रतनपुर बिलासपुर के नजदीक स्थित है। मोरध्वज का साम्राज्य क्षेत्र ही वर्तमान में छत्तीसगढ़ कहलाता है। एक बार राजा मोरध्वज अपनी सेना तथा परिवार के साथ राज्य में घूमने के लिए निकले थे। एक रात उन्होंने खारुन नदी तट पर डेरा डाला वह जगह वर्तमान में रायपुर का महादेव घाट कहलाता है। रानी के स्नान के लिए उनकी परिचालकों ने कपड़ों का घेरा बनाया। रानी जब पानी में जाने लगी तो उन्होंने देखा कि एक बड़े से पत्थर के ऊपर तीन विशालकाय सांप बैठे हैं। यह बात सुनकर राजा भी हैरान हुए। वे किसी अनहोनी की आशंका से चिंतित थे। तभी एक रात स्वप्न में माता महामाया ने आकर उनसे कहा कि मैं तुम्हारी कुलदेवी महिषासुर मर्दिनी महामाया हूँ। तुमने जिस पत्थर को देखा है वह मैं ही हूँ। इसके बाद राजा ने स्वयं जाकर अपनी देखरेख में पत्थर को उठवाया। पत्थर उल्टी पड़ी हुई थी। उसे सीधा किया तो महामाया की मूर्ति निकली। रायपुर के पुरानी बस्ती क्षेत्र में उसी दौरान एक मंदिर बनाई जा रही थी। कुछ बदलाव करके उस मूर्ति को वहीं पर स्थापित करवाई गई। विदित हो कि रतनपुर में भी महामाया का मंदिर स्थापित है जो अति प्राचीन और हैहयवंशी राजाओं की कुलदेवी भी है। यहीं से रतनपुर राज्य के विभाजन और रायपुर राज्य निर्माण की शुरुआत हुई। वैसे रायपुर को सतयुग में कनकपुर, त्रेतायुग में हाटकपुर और द्वापरयुग में कंचनपुर के रूप में भी वर्णन है। रतनपुर के हैहयवंशी राजा मोहनदेव ने अपने बड़े बेटे सूर्यदेव को रतनपुर तथा छोटे बेटे ब्रह्मदेव को रायपुर का शासक बनाया। ब्रह्मदेव ने अपनी राजधानी खलवाटिका को बनाया जो वर्तमान में खल्लारी कहलाती है जो महासमुंद जिले में स्थित है।ब्रह्मदेव ने रायपुर में एक जगह को भी विकसित किया जो वर्तमान में ब्रह्मपुरी कहलाती है। ब्रह्मदेव रतनपुर और खल्लारी में ही अधिक रहते थे। उनके बड़े बेटे रामचन्द्रदेव ने रायपुर को संवारना शुरू किया। उन्होंने खारुन नदी तट पर बस्ती बसाई जिसे उन्ही के नाम पर रायपुरा कहा जाता है। यहीं से रायपुर शहर का नाम विकसित हुआ। परिवार का मोह रतनपुर के लिए अधिक था। ज्यादातर वहीं से बैठकर रायपुर का शासन किया गया। साल 1408 में राजा मोहनदेव ने रायपुर पर ध्यान दिया यही से रायपुर विकसित होने लगा। महामाया मन्दिर को समय समय पर देखरेख कर सजाया सँवारा गया। एक कुछ ऐसे शिलालेख मिले हैं जो पाली भाषा में है। हैहयवंशी राजाओं के बाद भोंसले राजाओं ने भी मन्दिर के विकास में योगदान दिया था। मन्दिर के खर्च के लिए तीन गांव दान में दिए गए उनमें से एक गांव में आज भी इस मंदिर की सम्पत्ति मौजूद है। इस गांव का नाम है महामाया जामगांव। ( क्रमशः)


सन्डे की चकल्लस अब यहां भी मतलब रायपुर के इतिहास, संस्कृति और खानपान की झलक